ऐसी कम-से-कम प्राचीन लोगों की धारणा कभी नहीं थी। मैजिनी के कथानुसार, स्वर्ग और पृथ्वी को किसी एक बांस के बीच में बांधकर अलग नहीं किया गया है। ये दोनों तो एक ही वस्तु के दो छोर हैं। ऐसी ही प्राचीन जनों की पूर्वा पर यथार्थ एवं परिपक्व धारणा है। हमारी स्वधर्म के कल्पना स्वराज्य से भिन्न नहीं है। ये दोनों साध्य नाते से संलग्न हैं। स्वधर्म के बिना स्वराज्य तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। स्वराज्य
ऐसी कम-से-कम प्राचीन लोगों की धारणा कभी नहीं थी। मैजिनी के कथानुसार, स्वर्ग और पृथ्वी को किसी एक बांस के बीच में बांधकर अलग नहीं किया गया है। ये दोनों तो एक ही वस्तु के दो छोर हैं। ऐसी ही प्राचीन जनों की पूर्वा पर यथार्थ एवं परिपक्व धारणा है। हमारी स्वधर्म के कल्पना स्वराज्य से भिन्न नहीं है। ये दोनों साध्य नाते से संलग्न हैं। स्वधर्म के बिना स्वराज्य तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। स्वराज्य