1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

को भोगते हुए अंगे्रजी मन चाहे जितना व्याकुल होता हो, फिर भी उसका राष्ट्र उसकी शक्तियों को हमेशा नियंत्रित करता रहता है। अपने राष्ट्र की उŸाम सेवा किस तरह करें, इस संबंध में उसका व्यक्तिगत मत कुछ भी क्यों न हो, परंतु जब सरकार का यार उस राष्ट्र का मत उसके मत से भिन्न हो तो अपना निजी मत एक तरफ रख देशसŸाा के आदेश की जेसी भी विजय हो, उधर ही अंगे्रज दिन-रात लगा रहता है। नील ने ऐसा ही उदाŸा व्यवहार किया और


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को भोगते हुए अंगे्रजी मन चाहे जितना व्याकुल होता हो, फिर भी उसका राष्ट्र उसकी शक्तियों को हमेशा नियंत्रित करता रहता है। अपने राष्ट्र की उŸाम सेवा किस तरह करें, इस संबंध में उसका व्यक्तिगत मत कुछ भी क्यों न हो, परंतु जब सरकार का यार उस राष्ट्र का मत उसके मत से भिन्न हो तो अपना निजी मत एक तरफ रख देशसŸाा के आदेश की जेसी भी विजय हो, उधर ही अंगे्रज दिन-रात लगा रहता है। नील ने ऐसा ही उदाŸा व्यवहार किया और


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