सेना के 25 सितंबर तक लगभग सात सौ लोग मारे गए थे। घायल और स्वस्थ, ऐसे लगभग पांच सौ यूरोपियन और चार सौ नेटिव जीवति थे। इन लोगों की मुक्ति के लिए निकले हैवलाॅक की सेना के रेसीडेंसी तक पहुंचते सात सौ बाईस आदमी खेत रहे। इतने शूर लोगों का रक्त दिया तब लखनऊ को जीता जा सका।
परंतु दुष्ट निराशा, तू फिर भी अजित-की-अजित ही है। हैवलाॅक ने शत्रु का कितना भी पीछा किया हो, पर तू उसका पीछा नहीं छोड़ रही। क्योंकि इतनी विजय,
सेना के 25 सितंबर तक लगभग सात सौ लोग मारे गए थे। घायल और स्वस्थ, ऐसे लगभग पांच सौ यूरोपियन और चार सौ नेटिव जीवति थे। इन लोगों की मुक्ति के लिए निकले हैवलाॅक की सेना के रेसीडेंसी तक पहुंचते सात सौ बाईस आदमी खेत रहे। इतने शूर लोगों का रक्त दिया तब लखनऊ को जीता जा सका।
परंतु दुष्ट निराशा, तू फिर भी अजित-की-अजित ही है। हैवलाॅक ने शत्रु का कितना भी पीछा किया हो, पर तू उसका पीछा नहीं छोड़ रही। क्योंकि इतनी विजय,