कर निगल जाएंगी। जिस समय विद्रोह की यह धारा पुनः मर्यादित होगी और अपने आपको सीमाओं में आबद्ध
1857 का स्वातंत्र्य समर - 42
कर लेगी तो राष्ट्रभक्त भारत अपने विदेशी शासकों से अपने आपको स्वतंत्र कर लेगा तथा वह देशी राजाओं के स्वतंत्र राज्यदंड के सम्मुख नतमस्तक होगा। अब यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप ग्रहण कर चुका था। यह विद्रोह उस संपूर्ण जनता के विद्रोह का रूप धारण कर चुका था जो काल्पनिक गलतियांे से
कर निगल जाएंगी। जिस समय विद्रोह की यह धारा पुनः मर्यादित होगी और अपने आपको सीमाओं में आबद्ध
1857 का स्वातंत्र्य समर - 42
कर लेगी तो राष्ट्रभक्त भारत अपने विदेशी शासकों से अपने आपको स्वतंत्र कर लेगा तथा वह देशी राजाओं के स्वतंत्र राज्यदंड के सम्मुख नतमस्तक होगा। अब यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप ग्रहण कर चुका था। यह विद्रोह उस संपूर्ण जनता के विद्रोह का रूप धारण कर चुका था जो काल्पनिक गलतियांे से