चली गई। फिर रानी बांकाबाई क्या कर रही थी? वह अपनी षेश आयु ‘राजनिश्ठा’ में बिता रही थी। जब सन् 1847 मंे झांसी में बिजली कड़क रही थी तब इधर ‘बांका’ नागपुर में अपने पुत्रों के मन में स्वराज्य के लिए तलवार उठाने की इच्छा जाग्रत होने की संभावना को देख ‘‘मैं स्वयं तुम्हारे नाम सरकार को बताऊंगी और तुम्हारे सिर कलम करने की सलाह दूंगी’’-ऐसी धौंस दे रही थी। कुल-कलंकिनी बांका, जा पड़ नरक में-यदि वहां भी देषद्रोहियों को प्रवेष हो तो।
चली गई। फिर रानी बांकाबाई क्या कर रही थी? वह अपनी षेश आयु ‘राजनिश्ठा’ में बिता रही थी। जब सन् 1847 मंे झांसी में बिजली कड़क रही थी तब इधर ‘बांका’ नागपुर में अपने पुत्रों के मन में स्वराज्य के लिए तलवार उठाने की इच्छा जाग्रत होने की संभावना को देख ‘‘मैं स्वयं तुम्हारे नाम सरकार को बताऊंगी और तुम्हारे सिर कलम करने की सलाह दूंगी’’-ऐसी धौंस दे रही थी। कुल-कलंकिनी बांका, जा पड़ नरक में-यदि वहां भी देषद्रोहियों को प्रवेष हो तो।