पहली बार खरीदनेवाले कुल-कलंकी अंतिम रावबाजी पुणे की राजगद्दी से उतरकर भागीरथी के तीर पर इसी समय आए थे। उनके साथ ही महाराश्ट्र से बहुत से परिवार भी आए थे और यह सुनकर कि उन सब परिवारों का योगक्षेम आश्रय मंे आकर रहने लगे। माधवराव नारायण भी इन्हीं लोगों के साथ सन् 1827 में ब्रह्यवतर्् में रावबाजी के आश्रय में रहने सपरिवार चले गए। वहां रावबाजी की माधवराव के पुत्र से उनके बाल-तेज को देखकर रावबाजी इतने चकित हो गए कि कि माधवराव उनके सगोत्री हैं,
पहली बार खरीदनेवाले कुल-कलंकी अंतिम रावबाजी पुणे की राजगद्दी से उतरकर भागीरथी के तीर पर इसी समय आए थे। उनके साथ ही महाराश्ट्र से बहुत से परिवार भी आए थे और यह सुनकर कि उन सब परिवारों का योगक्षेम आश्रय मंे आकर रहने लगे। माधवराव नारायण भी इन्हीं लोगों के साथ सन् 1827 में ब्रह्यवतर्् में रावबाजी के आश्रय में रहने सपरिवार चले गए। वहां रावबाजी की माधवराव के पुत्र से उनके बाल-तेज को देखकर रावबाजी इतने चकित हो गए कि कि माधवराव उनके सगोत्री हैं,