यह ज्ञात होते ही उन्होंने नाना साहब को 7 जून, 1827 को दत्तक के रूप में ग्रहण कर लिया। उस समय नाना साहब की आयु केवल ढाई वर्श की थी। इस रतह वेणुग्राम में जनमा यह बालक अपने पूर्वसंचित पुण्य अंष के कारण महाराश्ट्र राज्य के अधिपति की गद्दी का वारिस हो गया। पेषवा की गद्दी का वारिस होना महाभाग्य की बात है। परंतु ऐ तेजस्वी राजकुमार! उस भाग्य के साथ ही आनेवाला उत्तदायित्व भी तुम्हें समरण है कि नहीं? पेषवाओं
यह ज्ञात होते ही उन्होंने नाना साहब को 7 जून, 1827 को दत्तक के रूप में ग्रहण कर लिया। उस समय नाना साहब की आयु केवल ढाई वर्श की थी। इस रतह वेणुग्राम में जनमा यह बालक अपने पूर्वसंचित पुण्य अंष के कारण महाराश्ट्र राज्य के अधिपति की गद्दी का वारिस हो गया। पेषवा की गद्दी का वारिस होना महाभाग्य की बात है। परंतु ऐ तेजस्वी राजकुमार! उस भाग्य के साथ ही आनेवाला उत्तदायित्व भी तुम्हें समरण है कि नहीं? पेषवाओं