में जलना होगा। इसके सिवाए पेषवा की गद्दी का सम्मान तीसरे किसी उपाय से नहीं होगा। हे तेजस्वी राजकुमार! यह दायित्व ध्यान में रखकर तू महाराश्ट्र की गद्दी पर सुख से बैठ। पेषवा की गद्दी षरणागत हुई, यह सुनने का अवसर तेरे बा पके कारण आने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 54
से सब ओर लज्जा की कालिमा छा गई थी और सबकी यह इच्छा थी कि पेशवा की गद्दी का अंत होना ही है तो वह उसके प्रारंभ जैसा उज्जवल हो। मरना हो तो मारते-मारते
में जलना होगा। इसके सिवाए पेषवा की गद्दी का सम्मान तीसरे किसी उपाय से नहीं होगा। हे तेजस्वी राजकुमार! यह दायित्व ध्यान में रखकर तू महाराश्ट्र की गद्दी पर सुख से बैठ। पेषवा की गद्दी षरणागत हुई, यह सुनने का अवसर तेरे बा पके कारण आने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 54
से सब ओर लज्जा की कालिमा छा गई थी और सबकी यह इच्छा थी कि पेशवा की गद्दी का अंत होना ही है तो वह उसके प्रारंभ जैसा उज्जवल हो। मरना हो तो मारते-मारते