न छोड़ते हुए वहां उन्होंने अंगे्रजी और फ्रेंच भाशा का अच्छा परिचय प्राप्त किया। ये दो भाशाएं अच्छी तरह सीख लेने पर उन्होंने कानपुर के एक स्कूल में षेश अघ्ययन किया और थोड़े ही दिनों में वहां की सरकारी पाठषाला में षिक्षक हो गए। उनकी बुद्धिमत्ता की कीर्ति नाना साहब के कानों में पड़ते ही उन्होंने उन्हें अपने दरबार मं रख लिया। सन् 1854 में अजीमुल्ला खान इंग्लैंड गए। अंगे्रजी रीति-रिवाजों की संपूर्ण जानकारी
न छोड़ते हुए वहां उन्होंने अंगे्रजी और फ्रेंच भाशा का अच्छा परिचय प्राप्त किया। ये दो भाशाएं अच्छी तरह सीख लेने पर उन्होंने कानपुर के एक स्कूल में षेश अघ्ययन किया और थोड़े ही दिनों में वहां की सरकारी पाठषाला में षिक्षक हो गए। उनकी बुद्धिमत्ता की कीर्ति नाना साहब के कानों में पड़ते ही उन्होंने उन्हें अपने दरबार मं रख लिया। सन् 1854 में अजीमुल्ला खान इंग्लैंड गए। अंगे्रजी रीति-रिवाजों की संपूर्ण जानकारी