था। कभी-कभी कानपुर की सेना के यूरोपीय अधिकारियों को वे पार्टियां देते थे; परंतु उनके निमंत्रण को वे कभी स्वीकार नहीं करते थे, क्योंकि उनकी पात्रता के अनुसार तोपों की सलामी देना कंपनी को स्वीकार न था। वे अपने प्रदेश के लोगों से बहुत स्नेह करते थे। उनका स्वभाव गंभीर और रहन-सहन बहुत सादा था। किसी तरह के दुव्र्यसन का उन्हें रत्ती भर भी शौक नहीं था। उनका कई बार निरीक्षण कर चुके एक सज्जन लिखते हैं-
‘‘मैंने जब उन्हें देखा,
था। कभी-कभी कानपुर की सेना के यूरोपीय अधिकारियों को वे पार्टियां देते थे; परंतु उनके निमंत्रण को वे कभी स्वीकार नहीं करते थे, क्योंकि उनकी पात्रता के अनुसार तोपों की सलामी देना कंपनी को स्वीकार न था। वे अपने प्रदेश के लोगों से बहुत स्नेह करते थे। उनका स्वभाव गंभीर और रहन-सहन बहुत सादा था। किसी तरह के दुव्र्यसन का उन्हें रत्ती भर भी शौक नहीं था। उनका कई बार निरीक्षण कर चुके एक सज्जन लिखते हैं-
‘‘मैंने जब उन्हें देखा,