1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

इस यज्ञ से जब तक मर्तिमंत प्रतिशोध अपनी सहó जिहृाएं सहó दांतों से युक्त होकर आविर्भूत न हो तब तक हवनकुंड में हवन करते ही जाना है। इंद्रजित् के समय वानर उस यज्ञ को भंग करने के लिए प्रयासरत थे। परंतु सौभाग्य से इस राष्ट्र-यज्ञ में सहायता करने के लिए अंगे्रज स्वयं ही उतावले हो रहे हैं। फिर विलंब क्यों? कोप की अग्नि भभक रही है और उसकी सातों जीभें लपलपाती हुई उछल रही हैं। फिर विलंब क्यों? चलो, आहुति डालना प्रारंभ करो!


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इस यज्ञ से जब तक मर्तिमंत प्रतिशोध अपनी सहó जिहृाएं सहó दांतों से युक्त होकर आविर्भूत न हो तब तक हवनकुंड में हवन करते ही जाना है। इंद्रजित् के समय वानर उस यज्ञ को भंग करने के लिए प्रयासरत थे। परंतु सौभाग्य से इस राष्ट्र-यज्ञ में सहायता करने के लिए अंगे्रज स्वयं ही उतावले हो रहे हैं। फिर विलंब क्यों? कोप की अग्नि भभक रही है और उसकी सातों जीभें लपलपाती हुई उछल रही हैं। फिर विलंब क्यों? चलो, आहुति डालना प्रारंभ करो!


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