1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

इसलिए चल आ, रे डलहौजी! उस ब्रह्यदेश को उसके वास्तविक मालिक से छीनकर ले आ। अग्नि चेत गई है तो इष्ट सिद्धि के लिए इस ब्रह्यदेश को धकेलो उसमें!

सतारा के शिवाजी की गद्दी कहां है? उसका मान तीसरे हवन का है। इसलिए उस पर बैठे राजाओं को श्मशान में बैठने को कहकर वह गद्दी, अंगे्रजी जाओ और जल्दी ले आओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए मराठों की ओर से सतारा की इस राजगद्दी को धकेलो उसमें!

इस चैथे हवन को केवल नागपुर


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इसलिए चल आ, रे डलहौजी! उस ब्रह्यदेश को उसके वास्तविक मालिक से छीनकर ले आ। अग्नि चेत गई है तो इष्ट सिद्धि के लिए इस ब्रह्यदेश को धकेलो उसमें!

सतारा के शिवाजी की गद्दी कहां है? उसका मान तीसरे हवन का है। इसलिए उस पर बैठे राजाओं को श्मशान में बैठने को कहकर वह गद्दी, अंगे्रजी जाओ और जल्दी ले आओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए मराठों की ओर से सतारा की इस राजगद्दी को धकेलो उसमें!

इस चैथे हवन को केवल नागपुर


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