1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar



अंगूल के राजा, धकेलो उसमें!

सिक्कत के भाग, धकेलो उसमें!

संबलपुर के राज्य, धकेलो उसमें!

खैरपुर के अमीर, धकेलो उसमें!

ऐसे रूपए और चिल्लर कितने गल गए, इसकी कोई गिनती नहीं! इसलिए ऐसे हविर्दान कौन गिने! अत्यंत पुष्ट और पूरी तरह निरपराध बलि लखनऊ के नवाब के अतिरिक्त मिलना कठिन है, इसलिए लखनऊ के नवाब को धकेलो उसमें!

अहा-हा! इस अग्नि-कल्लोल से ऊपर निकलते देवता की यह केसी उग्रता! इस प्रतिशोध के भयानक


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अंगूल के राजा, धकेलो उसमें!

सिक्कत के भाग, धकेलो उसमें!

संबलपुर के राज्य, धकेलो उसमें!

खैरपुर के अमीर, धकेलो उसमें!

ऐसे रूपए और चिल्लर कितने गल गए, इसकी कोई गिनती नहीं! इसलिए ऐसे हविर्दान कौन गिने! अत्यंत पुष्ट और पूरी तरह निरपराध बलि लखनऊ के नवाब के अतिरिक्त मिलना कठिन है, इसलिए लखनऊ के नवाब को धकेलो उसमें!

अहा-हा! इस अग्नि-कल्लोल से ऊपर निकलते देवता की यह केसी उग्रता! इस प्रतिशोध के भयानक


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