1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

तरह स्नान करावें। सतारा की गद्दी के टुकड़े देखकर गुस्से में भरे शिवाजी उस देवता को चैतन्य करें। अवध के राजमहल की बेगमों के कष्ट और नागपुर के महलों में अपमान के कारण मरी हुई अन्नपूर्णाबाई की आत्मा हमारे उस राष्ट्रीय प्रतिशोध को चेताए। हे प्रतिशोध! जग के न्याय! तलवार की धार पर तू चढ़ता है तो तू देवों को भी वंदनीय और ऋषियों को भी स्तुत्य हो जाता है। सज्जन रक्षक प्रतिशोध! तेरा डर न हो तो अन्याय का कलि इस


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तरह स्नान करावें। सतारा की गद्दी के टुकड़े देखकर गुस्से में भरे शिवाजी उस देवता को चैतन्य करें। अवध के राजमहल की बेगमों के कष्ट और नागपुर के महलों में अपमान के कारण मरी हुई अन्नपूर्णाबाई की आत्मा हमारे उस राष्ट्रीय प्रतिशोध को चेताए। हे प्रतिशोध! जग के न्याय! तलवार की धार पर तू चढ़ता है तो तू देवों को भी वंदनीय और ऋषियों को भी स्तुत्य हो जाता है। सज्जन रक्षक प्रतिशोध! तेरा डर न हो तो अन्याय का कलि इस


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