1857 का स्वातंत्र्य समर - 70
स्वतंत्रता और स्वराज्य की जय-जयकार हो, ऐसी परमेश्वर की इच्छा हो तो तू इस यज्ञ से मर्तिमंत हो प्रकट होना। धन्य-धन्य!! ‘मृत्यु सर्वहरश्चाहम्’-ऐसी गर्जना करते यह मर्तिमंत राष्ट्र-क्षोभ ऊपर आ रहा है। इस भयंकर गर्ति को शतशः प्रणाम है। जिसके भयंकर जबड़ों में उन्मत्त राज; पिस जाते हैं, जिसके हाथ के घन से निरपराध देशों के पैरों में पड़ी दासता की बेड़ियां तड़ाक से टूट जाती हैं,
1857 का स्वातंत्र्य समर - 70
स्वतंत्रता और स्वराज्य की जय-जयकार हो, ऐसी परमेश्वर की इच्छा हो तो तू इस यज्ञ से मर्तिमंत हो प्रकट होना। धन्य-धन्य!! ‘मृत्यु सर्वहरश्चाहम्’-ऐसी गर्जना करते यह मर्तिमंत राष्ट्र-क्षोभ ऊपर आ रहा है। इस भयंकर गर्ति को शतशः प्रणाम है। जिसके भयंकर जबड़ों में उन्मत्त राज; पिस जाते हैं, जिसके हाथ के घन से निरपराध देशों के पैरों में पड़ी दासता की बेड़ियां तड़ाक से टूट जाती हैं,