तस्मात् युद्धाएं युज्यस्व!!
ऐसी दैवी चेतना श्रीमंत नाना साहब के नेत्रों को अधिक उग्रता और अधिक तेजस्विता देने लगी। श्री शिवराय को जो कर्तव्य निभाना पड़ा वही महान् कार्य अपने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 79
हिस्से में आया है, इसलिए जय या पराजय जो भी मिले, मुझे तो स्वतंत्रता का नूतन ‘शिवराज’ या प्रथम पेशवा का मान बढ़ानेवाला अंतिम पेशवा बनना है-उनमें मन ने यह दृढ़ निश्चय किया।
अपने देश और स्वराज्य
तस्मात् युद्धाएं युज्यस्व!!
ऐसी दैवी चेतना श्रीमंत नाना साहब के नेत्रों को अधिक उग्रता और अधिक तेजस्विता देने लगी। श्री शिवराय को जो कर्तव्य निभाना पड़ा वही महान् कार्य अपने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 79
हिस्से में आया है, इसलिए जय या पराजय जो भी मिले, मुझे तो स्वतंत्रता का नूतन ‘शिवराज’ या प्रथम पेशवा का मान बढ़ानेवाला अंतिम पेशवा बनना है-उनमें मन ने यह दृढ़ निश्चय किया।
अपने देश और स्वराज्य