1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar




1857 का स्वातंत्र्य समर - 90

भी नहीं जान पा रहा था। ये देवदूत जिसे समझ में आता उसी को मुख्य संदेश देते और जिसे ठीक न समझते उससे खूब बतियाते। इस विचित्र रोटी को कुछ पगले अंगे्रज अधिकारियों ने पकड़-पकड़कर उसका चूरा किया और फिर उस चूरे का भ चूरा बनाकर उससे कुछ कहलवाने के प्रयास किए; परंतु किसी चुडै़ल की तरह उस चपाती को बोलने को कहते ही वह अपने मुंह की जीभ ही नष्ट कर देती और जिससे मन होता उसी से बोलती।


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1857 का स्वातंत्र्य समर - 90

भी नहीं जान पा रहा था। ये देवदूत जिसे समझ में आता उसी को मुख्य संदेश देते और जिसे ठीक न समझते उससे खूब बतियाते। इस विचित्र रोटी को कुछ पगले अंगे्रज अधिकारियों ने पकड़-पकड़कर उसका चूरा किया और फिर उस चूरे का भ चूरा बनाकर उससे कुछ कहलवाने के प्रयास किए; परंतु किसी चुडै़ल की तरह उस चपाती को बोलने को कहते ही वह अपने मुंह की जीभ ही नष्ट कर देती और जिससे मन होता उसी से बोलती।


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