1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

वह रोटी गेूहंू या बाजरे के आटे की बनी होती थी। उस पर यद्यपि कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता था, फिर भ वह हाथ में आते ही, उसका स्पर्श होते ही हर व्यक्ति की देह में क्रांति चेतना संचार करने लगती। हर गांव में मुखिया के पास वे रोटियां आती। वह स्वयं उसका एक टुकड़ा खाता और उसका प्रसाद के रूप में सारे गांव में बांट देता। फिर उतनी ही जाता रोटियां बनवाकर वे गांववाले पड़ोस के गांव में भिजवा देते।

जा, हे क्रांति के देवदूत ! ऐसे ही आगे जा। अपनी प्रिय माता,


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वह रोटी गेूहंू या बाजरे के आटे की बनी होती थी। उस पर यद्यपि कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता था, फिर भ वह हाथ में आते ही, उसका स्पर्श होते ही हर व्यक्ति की देह में क्रांति चेतना संचार करने लगती। हर गांव में मुखिया के पास वे रोटियां आती। वह स्वयं उसका एक टुकड़ा खाता और उसका प्रसाद के रूप में सारे गांव में बांट देता। फिर उतनी ही जाता रोटियां बनवाकर वे गांववाले पड़ोस के गांव में भिजवा देते।

जा, हे क्रांति के देवदूत ! ऐसे ही आगे जा। अपनी प्रिय माता,


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