1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

इस कारण एक क्षण भी न सहमते हुए यह भयंकर राष्ट्र-संदेश लेकर तू तीर की गति से बढ़ता जा। तेरी गति पर हमारी इस माता का जीवन और मृत्यु अवलंबित है। इसलिए तेरे पंख जितने काट सकें उतनी दूरी कम करते हुए पूरे वातावरण में उड़ान भरता जा। शत्रु ने तेरी दे हके किसी अंग का भंग किया तो भी हे मायावी देवदूत! हमारे राष्ट्र के इस संकट के समय में तू हजारों-लाखों देह धारण कर उस हर देह में जीभ लगाकर बढ़। पत्नी एवं पति, माता एवं बालक,


388 of 2102

इस कारण एक क्षण भी न सहमते हुए यह भयंकर राष्ट्र-संदेश लेकर तू तीर की गति से बढ़ता जा। तेरी गति पर हमारी इस माता का जीवन और मृत्यु अवलंबित है। इसलिए तेरे पंख जितने काट सकें उतनी दूरी कम करते हुए पूरे वातावरण में उड़ान भरता जा। शत्रु ने तेरी दे हके किसी अंग का भंग किया तो भी हे मायावी देवदूत! हमारे राष्ट्र के इस संकट के समय में तू हजारों-लाखों देह धारण कर उस हर देह में जीभ लगाकर बढ़। पत्नी एवं पति, माता एवं बालक,


388 of 2102