1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar



सावधान, मित्रों! सावधान!! और अपनी ही अकड़ में उस हरे-भरे पर्वत पर षांति से लेटे षत्रुओं, अब सावधान! यह पर्वत ऊपर से जितना हरा-भरा दिखता है उतना ही वह अंदर से भी हरा-भरा होगा, इस विष्वास से¹ तुम इसके माथे पर लातें मार रहे हो


1857 का स्वातंत्र्य समर - 91

क्या? मारो, वैसे ही मारते जाओ लातें! जल्दी ही तुम्हें कालिदास के शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमास्ति तेजः-इस वचन की सच्चाई ज्ञात होगी।


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सावधान, मित्रों! सावधान!! और अपनी ही अकड़ में उस हरे-भरे पर्वत पर षांति से लेटे षत्रुओं, अब सावधान! यह पर्वत ऊपर से जितना हरा-भरा दिखता है उतना ही वह अंदर से भी हरा-भरा होगा, इस विष्वास से¹ तुम इसके माथे पर लातें मार रहे हो


1857 का स्वातंत्र्य समर - 91

क्या? मारो, वैसे ही मारते जाओ लातें! जल्दी ही तुम्हें कालिदास के शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमास्ति तेजः-इस वचन की सच्चाई ज्ञात होगी।


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