स्वदेश बंधुओं के हाथ में आज फिरंगियों ने लोहे की बेड़ियां ठोक दीं, यह देखकर सारे भारतीय सिपाहियों के शरीर थर्रा उठे। पर सामने ही खड़ी तोपों को देखकर हर तलवार म्यान में ही फड़फड़ाती रही। फिर उन पचासी शूर सिपाहियों को-तुम्हें दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया है-यह सुनाया गया और हाथ-पैर की भारी-भारी बेड़ियों के बोझ तले झुके वे धर्मवीर
1857 का स्वातंत्र्य समर - 102
कारावास की ओर चल दिए। उस समय अपने
स्वदेश बंधुओं के हाथ में आज फिरंगियों ने लोहे की बेड़ियां ठोक दीं, यह देखकर सारे भारतीय सिपाहियों के शरीर थर्रा उठे। पर सामने ही खड़ी तोपों को देखकर हर तलवार म्यान में ही फड़फड़ाती रही। फिर उन पचासी शूर सिपाहियों को-तुम्हें दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया है-यह सुनाया गया और हाथ-पैर की भारी-भारी बेड़ियों के बोझ तले झुके वे धर्मवीर
1857 का स्वातंत्र्य समर - 102
कारावास की ओर चल दिए। उस समय अपने