1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

कहने लगी-‘‘तुम्हारे बाप कारावास में भेजे गए हैं और तुम यहां मक्खियां मारते फिर रहे हो। थू तुम्हारी जिंदगी पर!!’’ पहले ही गुस्से से पगलाए सिपाहियों को यह कैसे सहन होता कि रास्ते में औरतें उनके जीवन पर थूकें! उस दिन रात में सारी लाइन पर सिपाहियों की गुप्त बैठकें होती रही। क्या अब भी मई की 31 तारीख तक रूकना है।? इधर अपने भाइयों के कारावास में पडे़ होते हुए हम नामर्दों की तरह चुप होकर बैठें! रास्ते में औरतें-बच्चे अपने पर देशद्रोही कहकर थूकने लगें,


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कहने लगी-‘‘तुम्हारे बाप कारावास में भेजे गए हैं और तुम यहां मक्खियां मारते फिर रहे हो। थू तुम्हारी जिंदगी पर!!’’ पहले ही गुस्से से पगलाए सिपाहियों को यह कैसे सहन होता कि रास्ते में औरतें उनके जीवन पर थूकें! उस दिन रात में सारी लाइन पर सिपाहियों की गुप्त बैठकें होती रही। क्या अब भी मई की 31 तारीख तक रूकना है।? इधर अपने भाइयों के कारावास में पडे़ होते हुए हम नामर्दों की तरह चुप होकर बैठें! रास्ते में औरतें-बच्चे अपने पर देशद्रोही कहकर थूकने लगें,


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