हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी में स्वराज्य की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई। दिनांक 16 मई को दिल्ली में फिरंगी सŸाा का एक भी चिहृ शेष नहीं रहा था। अंगे्रजी वस्तुओं से दिल्ली को इतनी घृणा हो गई थी कि कोई अंगे्रजी भाषा का एक शब्द भी बोले तो उसे जमकर मार खानी पड़ती। अंगे्रजी निशान के टुकड़े गली-कूचों में कुचले जा रहे थे। और अपने आज तक के अपमान के दाग दासता के उष्ण रक्त से धोकर स्वच्छ हुआ स्वराज्य का चिहृ
हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी में स्वराज्य की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई। दिनांक 16 मई को दिल्ली में फिरंगी सŸाा का एक भी चिहृ शेष नहीं रहा था। अंगे्रजी वस्तुओं से दिल्ली को इतनी घृणा हो गई थी कि कोई अंगे्रजी भाषा का एक शब्द भी बोले तो उसे जमकर मार खानी पड़ती। अंगे्रजी निशान के टुकड़े गली-कूचों में कुचले जा रहे थे। और अपने आज तक के अपमान के दाग दासता के उष्ण रक्त से धोकर स्वच्छ हुआ स्वराज्य का चिहृ