उस प्रचंड क्रांति के सिर पर डोल रहा था। यह स्वतंत्रता की इच्छा इतनी प्रबल थी कि पहले पांच दिन में देशद्रोह की छूत कहीं नहीं लगी। पुरूष और महिलाएं, श्रीमंत व गरीब, तरूण और वृद्ध, सिपाही और नागरिक, मौलवी और पंडित, हिंदू और मुसलमान -सारे-के-सारे स्वदेश के निशान के नीचे अपने-अपने शस्त्र निकालकर परदेशी दासता पर हमले कर रहे थे। ऐसी विलक्षण स्वदेश-प्रीति और स्वातंन्न्य-प्रीति उबल रही थी और पर-सŸाा के प्रति
उस प्रचंड क्रांति के सिर पर डोल रहा था। यह स्वतंत्रता की इच्छा इतनी प्रबल थी कि पहले पांच दिन में देशद्रोह की छूत कहीं नहीं लगी। पुरूष और महिलाएं, श्रीमंत व गरीब, तरूण और वृद्ध, सिपाही और नागरिक, मौलवी और पंडित, हिंदू और मुसलमान -सारे-के-सारे स्वदेश के निशान के नीचे अपने-अपने शस्त्र निकालकर परदेशी दासता पर हमले कर रहे थे। ऐसी विलक्षण स्वदेश-प्रीति और स्वातंन्न्य-प्रीति उबल रही थी और पर-सŸाा के प्रति