सहायता मिलना पूरी तरह असंभव था। गाड़ियां मिली नहीं, मजूर मिले नहीं, रसद मिली नहीं, जख्मी लोगों के लिए डोली मिली नहीं। एॅडज्यूटेंट, क्र्वाटर मास्टर, मेडिकल चीफ-हर कोई अपने-अपने विभाग की तैयारी करना छोड़ -नकार’ का घंटा बजाने लगा। हिंदुस्थानी लोगों के आश्रय बिना अंगे्रजी सŸाा धूल पर की गई लिपाई जैसी है। सन् 1857 मंे इस कुचली हुई धूल में थोड़ा चैतन्य आते ही अंगे्रजों को अंबाला से दिल्ली तक आना कठिन हो गया।
सहायता मिलना पूरी तरह असंभव था। गाड़ियां मिली नहीं, मजूर मिले नहीं, रसद मिली नहीं, जख्मी लोगों के लिए डोली मिली नहीं। एॅडज्यूटेंट, क्र्वाटर मास्टर, मेडिकल चीफ-हर कोई अपने-अपने विभाग की तैयारी करना छोड़ -नकार’ का घंटा बजाने लगा। हिंदुस्थानी लोगों के आश्रय बिना अंगे्रजी सŸाा धूल पर की गई लिपाई जैसी है। सन् 1857 मंे इस कुचली हुई धूल में थोड़ा चैतन्य आते ही अंगे्रजों को अंबाला से दिल्ली तक आना कठिन हो गया।