द्वारा यह पूछताछ होने लगी कि अब एक-दो दिन में दिल्ली गिरने को है; परंतु वास्तविक स्थिति कितनी अलग थी। इस अभूतपूर्व, आकस्मिक और अस्त-व्यस्त क्रांतियुद्ध का विकराल स्वरूप देखकर भी वह पहला धक्का सहकर उस पर अंकुश लगाने की खूबी और हिम्मत यद्यपि उत्पन्न नहीं हुई थी, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रूकना नहीं, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रूकना नहीं,
द्वारा यह पूछताछ होने लगी कि अब एक-दो दिन में दिल्ली गिरने को है; परंतु वास्तविक स्थिति कितनी अलग थी। इस अभूतपूर्व, आकस्मिक और अस्त-व्यस्त क्रांतियुद्ध का विकराल स्वरूप देखकर भी वह पहला धक्का सहकर उस पर अंकुश लगाने की खूबी और हिम्मत यद्यपि उत्पन्न नहीं हुई थी, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रूकना नहीं, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रूकना नहीं,