परंतु क्रांतिकारियों के बहुत जोर लगाने पर भी सिख अंगे्रजों की ओर ही रहे।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 128
पंजाब में जहां-जहां सेना की रेजिमेंट थीं वे अधिकतर हिंदुस्थानी लोगों की थी। इस कारण उन सबने अंगे्रजों के विरूद्ध लड़ने के लिए कमर कसी हुई थी और वे अपने नियत संकेत-समय की प्रतीक्षा में रूके थे। केवल हिंदुस्थानी सिपाही ही पंजाब में स्वातंन्न्य को ललचाए थे, ऐसा बिल्कुल नहीं था; लष्कर के बाहर हर
परंतु क्रांतिकारियों के बहुत जोर लगाने पर भी सिख अंगे्रजों की ओर ही रहे।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 128
पंजाब में जहां-जहां सेना की रेजिमेंट थीं वे अधिकतर हिंदुस्थानी लोगों की थी। इस कारण उन सबने अंगे्रजों के विरूद्ध लड़ने के लिए कमर कसी हुई थी और वे अपने नियत संकेत-समय की प्रतीक्षा में रूके थे। केवल हिंदुस्थानी सिपाही ही पंजाब में स्वातंन्न्य को ललचाए थे, ऐसा बिल्कुल नहीं था; लष्कर के बाहर हर