में सफलता इतनी कठिन थी कि पेशावर के सिपाहियों की तरह ही चुपचाप शस्त्र नीचे रखकर फिरंगियों की शरण जाने की बात भी उनके मन में आने लगी। परंतु अब फिरंगी दासता की बेड़ियां पैरों में डाल लेने की अपेक्षा यमपाश गले में डलवा लेना उन वीरों को पसंद आया और अपने पीछे लगी अंगे्रजी सेना को उसने यह बात कह दी कि -अब लड़ते-लड़ते प्राण दिए। इस 55वीं रेजिमेंट की कहानी भी इतनी हृदयद्रावक है कि उसे सुनने पर-‘अपि ग्रावा रोदत्यपि
में सफलता इतनी कठिन थी कि पेशावर के सिपाहियों की तरह ही चुपचाप शस्त्र नीचे रखकर फिरंगियों की शरण जाने की बात भी उनके मन में आने लगी। परंतु अब फिरंगी दासता की बेड़ियां पैरों में डाल लेने की अपेक्षा यमपाश गले में डलवा लेना उन वीरों को पसंद आया और अपने पीछे लगी अंगे्रजी सेना को उसने यह बात कह दी कि -अब लड़ते-लड़ते प्राण दिए। इस 55वीं रेजिमेंट की कहानी भी इतनी हृदयद्रावक है कि उसे सुनने पर-‘अपि ग्रावा रोदत्यपि