अधिकारियों की अनुमति न लेते हुए जिस स्थान पर वह क्रांतिदूत ले जाया गया था, उस अलीगढ़ शहर की ओर चल दिया। दिनांक 20 मई की शाम को उस ब्राह्यण को फांसी दी गई। बगल में सारी रेजिमेंट खड़ी की गई थी। अब क्या करें? दिनांक 31 मई तक रूकें तो ब्राह्यण निकलता नहीं, निकल ही गया है और फांसी पर उसकी मृत देह प्रतिशोध का बीभत्स व्याख्यान देती लटकी हुई है। भयानक व्याख्यान! शब्द के स्थान पर जहां रक्त की धाराएं स्खलित बह
अधिकारियों की अनुमति न लेते हुए जिस स्थान पर वह क्रांतिदूत ले जाया गया था, उस अलीगढ़ शहर की ओर चल दिया। दिनांक 20 मई की शाम को उस ब्राह्यण को फांसी दी गई। बगल में सारी रेजिमेंट खड़ी की गई थी। अब क्या करें? दिनांक 31 मई तक रूकें तो ब्राह्यण निकलता नहीं, निकल ही गया है और फांसी पर उसकी मृत देह प्रतिशोध का बीभत्स व्याख्यान देती लटकी हुई है। भयानक व्याख्यान! शब्द के स्थान पर जहां रक्त की धाराएं स्खलित बह