1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

रही हैं। उस भयानक वक्ता ने जीवित रहते जो व्याख्यान कभी न किया हो, वह आज फांसी पर लटके एक शब्द भी न बोलते हुए कर दिया था। क्योंकि आधे क्षण में ही उन असंख्य सिपाहियों की भीड़ में से उछलकर एक सिपाही आगे आया और अपनी तलवार उस फांसी पर लटकते ब्राह्यण की ओर करके चिल्लाया, ‘‘अरे यार, यह शहीद रक्त में नहा रहा है।’’ बारूद के ढेर पर चढ़ी चिंगारी भी किंचित् देर से सुलगती, पर उस शूर सिपाही के मुंह से छूटी तेजस्वी


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रही हैं। उस भयानक वक्ता ने जीवित रहते जो व्याख्यान कभी न किया हो, वह आज फांसी पर लटके एक शब्द भी न बोलते हुए कर दिया था। क्योंकि आधे क्षण में ही उन असंख्य सिपाहियों की भीड़ में से उछलकर एक सिपाही आगे आया और अपनी तलवार उस फांसी पर लटकते ब्राह्यण की ओर करके चिल्लाया, ‘‘अरे यार, यह शहीद रक्त में नहा रहा है।’’ बारूद के ढेर पर चढ़ी चिंगारी भी किंचित् देर से सुलगती, पर उस शूर सिपाही के मुंह से छूटी तेजस्वी


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