अब ऐसी निमंत्रण-पत्रिका को कैसे ठुकराया जाए? ऐसे निमंत्रणों के बीच रूहेलखंड के अंतिम स्वतंत्र रोहिला सरदार हाफिज रहमत का वंशज भी बरेली में गुप्त षड्यंत्र के ताने-बाने बुन रहा था। इस खानबहादुर खान को अंगे्रजों की ओर से वह हाफिज रहमत खां का वंशज होने के नाते ‘एक’ और वह अंगे्रज सरकार में जज था,
1857 का स्वातंत्र्य समर - 146
इसलिए ‘दूसरी’-ऐसी दो पेंशनें मिलती थीं। अंगे्रज अधिकारियों का मुंह-लगा रहने में खान बहुत ही कुशल है,
अब ऐसी निमंत्रण-पत्रिका को कैसे ठुकराया जाए? ऐसे निमंत्रणों के बीच रूहेलखंड के अंतिम स्वतंत्र रोहिला सरदार हाफिज रहमत का वंशज भी बरेली में गुप्त षड्यंत्र के ताने-बाने बुन रहा था। इस खानबहादुर खान को अंगे्रजों की ओर से वह हाफिज रहमत खां का वंशज होने के नाते ‘एक’ और वह अंगे्रज सरकार में जज था,
1857 का स्वातंत्र्य समर - 146
इसलिए ‘दूसरी’-ऐसी दो पेंशनें मिलती थीं। अंगे्रज अधिकारियों का मुंह-लगा रहने में खान बहुत ही कुशल है,