तैयार नहीं था-’’ आज तक हमें नितांत ही अल्प भोजन पर अपने दिन गुजारने पड़े हैं। वस्तुतः कल मुझे अपने नाश्ते में जितना भोजन मिला था उससे तो एक श्वान का भी अपना पेट नहीं भर पाता।’’ ऐसा इलाहाबाद का एक अंगे्रज अधिकारी लिखता है। अपने कुŸो को भी जो खाना मैंने न खिलाया होता, वह खाना कलम ैं स्वयं खा रहा था। गरमी और भुखमरी से अंगे्रजों में हैजा शुरू हो गया और उसमें भी अंगे्रज सोल्जरों ने दारू पीकर धुŸा पड़े रहने
तैयार नहीं था-’’ आज तक हमें नितांत ही अल्प भोजन पर अपने दिन गुजारने पड़े हैं। वस्तुतः कल मुझे अपने नाश्ते में जितना भोजन मिला था उससे तो एक श्वान का भी अपना पेट नहीं भर पाता।’’ ऐसा इलाहाबाद का एक अंगे्रज अधिकारी लिखता है। अपने कुŸो को भी जो खाना मैंने न खिलाया होता, वह खाना कलम ैं स्वयं खा रहा था। गरमी और भुखमरी से अंगे्रजों में हैजा शुरू हो गया और उसमें भी अंगे्रज सोल्जरों ने दारू पीकर धुŸा पड़े रहने