1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

उन सारे युवा पुरूषों और मर्दाना स्त्रियों को एक बिजली अपनी चमकार से लज्जित कर रही थी। यह बिजली और कोई नहीं-पीछे जिसका परिचय दिया वह वेश्या अजीजन थी। उसने अपने माशूक वेश को लश्करी पेशे में ढाल लिया था। गाल पर लाली चढ़ी थी। होंठों पर हास्य था और वह घोड़े पर सवार थी। वह सशस्त्र भी थी और तोपखाने के सिपाही उसकी मुद्रा की ओर देखकर अपनी थकान भूल जाते। नानकचंद अपनी डायरी में लिखता है-‘‘सशस्त्र होकर अजीजन बिजली-सी


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उन सारे युवा पुरूषों और मर्दाना स्त्रियों को एक बिजली अपनी चमकार से लज्जित कर रही थी। यह बिजली और कोई नहीं-पीछे जिसका परिचय दिया वह वेश्या अजीजन थी। उसने अपने माशूक वेश को लश्करी पेशे में ढाल लिया था। गाल पर लाली चढ़ी थी। होंठों पर हास्य था और वह घोड़े पर सवार थी। वह सशस्त्र भी थी और तोपखाने के सिपाही उसकी मुद्रा की ओर देखकर अपनी थकान भूल जाते। नानकचंद अपनी डायरी में लिखता है-‘‘सशस्त्र होकर अजीजन बिजली-सी


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