1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

की दीवार पर से एक ब्राह्यण में झांककर देखा कि आज तक जो स्त्रियां पालकी के सिवाय एक कदम भी उठाती नहीं थीं वे सवयं के कपड़े धो रही हैं। ब्राह्यण को उनपर दया आ गई और उसने पड़ोसी से कहा, ‘‘उनके कपड़े धोबी को क्यों नहीं दिए जाते?’’ उस ब्राह्यण द्वारा बिना बात दिखाई गई इस मानवता के प्रति घृणा से उस पड़ोसी ने ब्राह्यण को एक चांटा मारा। कैद की कुछ ही स्त्रियों से चक्की पिसवाई जाती और उसके बदले में उनको एक रोटी


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की दीवार पर से एक ब्राह्यण में झांककर देखा कि आज तक जो स्त्रियां पालकी के सिवाय एक कदम भी उठाती नहीं थीं वे सवयं के कपड़े धो रही हैं। ब्राह्यण को उनपर दया आ गई और उसने पड़ोसी से कहा, ‘‘उनके कपड़े धोबी को क्यों नहीं दिए जाते?’’ उस ब्राह्यण द्वारा बिना बात दिखाई गई इस मानवता के प्रति घृणा से उस पड़ोसी ने ब्राह्यण को एक चांटा मारा। कैद की कुछ ही स्त्रियों से चक्की पिसवाई जाती और उसके बदले में उनको एक रोटी


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