उनके आते ही उनको ‘खड़ी तालीम’ दी गई। प्रथमतः दिल्ली के बादशाह के नाम एक सौ एक तोपें दागी गई। सन् 1857 में हिंदू-मुसलमानों ने कितने आदर से और बंधुत्व भाव से एक-दूसरे से अंत तक व्यवहार किया-यह यहां ध्यान में रखने लायक है। बाद में श्रीमंत नाना साहब की सवारी मैदान में आई, यह देखते ही सबने महाराज की जय-जयकार की और उन्हें भी इक्कीस तोपों की सलामी दी गई। लड़ाई के इक्कीस दिनों के लिए ये इक्कीस तोपें थीं-ऐसा
उनके आते ही उनको ‘खड़ी तालीम’ दी गई। प्रथमतः दिल्ली के बादशाह के नाम एक सौ एक तोपें दागी गई। सन् 1857 में हिंदू-मुसलमानों ने कितने आदर से और बंधुत्व भाव से एक-दूसरे से अंत तक व्यवहार किया-यह यहां ध्यान में रखने लायक है। बाद में श्रीमंत नाना साहब की सवारी मैदान में आई, यह देखते ही सबने महाराज की जय-जयकार की और उन्हें भी इक्कीस तोपों की सलामी दी गई। लड़ाई के इक्कीस दिनों के लिए ये इक्कीस तोपें थीं-ऐसा