सिंहासन समारोहिपूर्वक सुमंत्रित कर दरबार में लाया गया। श्रीमंत नाना साहब के मस्तिष्क पर राजतिलक लगाया गया और हजारों नागरिकों और तोपों के धमाकों-जयघोषों में श्रीमंत नाना साहब पेशवा एक स्वतंत्र और स्वकष्टार्टित, स्वदेश-सम्मत और स्वधर्म-प्रतिपालक सिंहासन पर चढ़ गए। उस दिन कानपुर से हजारों लोगों ने नाना को नजराने और उपहार भेजे थे। हिंदू लोग खुला कहने लगे-‘आज से अब राजा रामचंद्र की विजय होगी। स्वधर्म और
सिंहासन समारोहिपूर्वक सुमंत्रित कर दरबार में लाया गया। श्रीमंत नाना साहब के मस्तिष्क पर राजतिलक लगाया गया और हजारों नागरिकों और तोपों के धमाकों-जयघोषों में श्रीमंत नाना साहब पेशवा एक स्वतंत्र और स्वकष्टार्टित, स्वदेश-सम्मत और स्वधर्म-प्रतिपालक सिंहासन पर चढ़ गए। उस दिन कानपुर से हजारों लोगों ने नाना को नजराने और उपहार भेजे थे। हिंदू लोग खुला कहने लगे-‘आज से अब राजा रामचंद्र की विजय होगी। स्वधर्म और