1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

प्रज्ञा को अपने संदेश की अस्पश्टता से प्रज्वलित कर दिया था। तत्पश्चाात् हमें श्रवण करने दें उस दहाड़ती हुई गर्जना का, जिसके साथ ज्वालामुखी अंततः फूट पड़ा था अपने समस्त ध्वंसकारी बल के साथ और जो अपने रक्त-तत्व लावा


25

प्रवाह में सभी को छिन्न-भिन्न करता, जलाता और भस्म करता चला गया था। एक माह के भीतर रेजीमेंट-पर-रेजीमेंट, रजवाड़ों-पर-रजवाड़े, नगर-पर-नगरए सिपाही, पुलिस, जमींदार, पंडित, मौलवी और बहुमखी


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प्रज्ञा को अपने संदेश की अस्पश्टता से प्रज्वलित कर दिया था। तत्पश्चाात् हमें श्रवण करने दें उस दहाड़ती हुई गर्जना का, जिसके साथ ज्वालामुखी अंततः फूट पड़ा था अपने समस्त ध्वंसकारी बल के साथ और जो अपने रक्त-तत्व लावा


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प्रवाह में सभी को छिन्न-भिन्न करता, जलाता और भस्म करता चला गया था। एक माह के भीतर रेजीमेंट-पर-रेजीमेंट, रजवाड़ों-पर-रजवाड़े, नगर-पर-नगरए सिपाही, पुलिस, जमींदार, पंडित, मौलवी और बहुमखी


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