1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

भी अपने हाथ में बांधा था।देश के दरवाजे पर पहरा देने के लिए रतजगा किया था और उस दरवाजे से देश में घुसना चाहनेवाली विदेशी सŸाा को रोकने के लिए अब उसने हाथ में अपना सर्वस्व स्वदेश और स्वधर्म को अर्पण किया और वह मौलवी स्वयं हिंदुस्थान भर राज्य क्रांति का उपदेश देते हुए पर्यटन करने निकला। यह राजनीतिक संन्यासी जिस-जिस प्रदेश में अपनी चरणरज डालता गया वहां-वहां लोकशक्ति में कुछ विलक्षण चेतना का संचार होता


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भी अपने हाथ में बांधा था।देश के दरवाजे पर पहरा देने के लिए रतजगा किया था और उस दरवाजे से देश में घुसना चाहनेवाली विदेशी सŸाा को रोकने के लिए अब उसने हाथ में अपना सर्वस्व स्वदेश और स्वधर्म को अर्पण किया और वह मौलवी स्वयं हिंदुस्थान भर राज्य क्रांति का उपदेश देते हुए पर्यटन करने निकला। यह राजनीतिक संन्यासी जिस-जिस प्रदेश में अपनी चरणरज डालता गया वहां-वहां लोकशक्ति में कुछ विलक्षण चेतना का संचार होता


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