भारतीय दर्शन पर लागू किया और अद्वैत को धर्मशास्त्र की चरम सीमा बताया।
ऐसा अनायास नहीं हुआ। इसके भौतिक और आर्थिक कारण थे, एक विशेष प्रयोजन था। इसे समझने के लिए हमें उस समय की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थिति को समझना होगा।
उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्व में हमारे देश में पूंजीवादी वर्ग अस्तित्व में आया था और वह स्वभावतः विस्तार चाहता था। पर उसके विस्तार का मार्ग विदेशी
साम्राज्यवादी शासकों ने अवरूद्व कर रखा था। अंग्रेज शासक सैन्य बल में बढे़-चढे़ थे,
भारतीय दर्शन पर लागू किया और अद्वैत को धर्मशास्त्र की चरम सीमा बताया।
ऐसा अनायास नहीं हुआ। इसके भौतिक और आर्थिक कारण थे, एक विशेष प्रयोजन था। इसे समझने के लिए हमें उस समय की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थिति को समझना होगा।
उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्व में हमारे देश में पूंजीवादी वर्ग अस्तित्व में आया था और वह स्वभावतः विस्तार चाहता था। पर उसके विस्तार का मार्ग विदेशी
साम्राज्यवादी शासकों ने अवरूद्व कर रखा था। अंग्रेज शासक सैन्य बल में बढे़-चढे़ थे,