अन्य शक्तियां जिसकी अभिव्यक्ति हैं, तब वह वहीं रूक जाएगी। वैसे ही, धर्मशास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त कर लेगा, जब वह उसको खोज लेगा, जो इस मृत्यु के इस लोक में एकमात्र जीवन है, अन्य सब आत्माएं जिसकी प्रतीयमान अभिव्यक्तियां है। इस प्रकार अनेकता और द्वैत में होते हुए इस परम अद्वैत की प्राप्ति होती है। धर्म इससे आगे नहीं जा सकता। यही समस्त विज्ञानों का चरम लक्ष्य है।’’
विवेकानन्द ने पहली बार क्रमविकास का सिद्वांत
अन्य शक्तियां जिसकी अभिव्यक्ति हैं, तब वह वहीं रूक जाएगी। वैसे ही, धर्मशास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त कर लेगा, जब वह उसको खोज लेगा, जो इस मृत्यु के इस लोक में एकमात्र जीवन है, अन्य सब आत्माएं जिसकी प्रतीयमान अभिव्यक्तियां है। इस प्रकार अनेकता और द्वैत में होते हुए इस परम अद्वैत की प्राप्ति होती है। धर्म इससे आगे नहीं जा सकता। यही समस्त विज्ञानों का चरम लक्ष्य है।’’
विवेकानन्द ने पहली बार क्रमविकास का सिद्वांत