अतीत की ओर गर्व से देखता है और अपने राष्ट्रीय आन्दोलन में इतिहास से शास्त्रागार का काम लेता है और वह हमारे देश के उभरते हुए पूंजीपति वर्ग ने भी लिया और लेना स्वाभाविक भी था।
इन सब आघात-प्रतिघातों से नव-जागरण की वह भव्य तरंग उत्पन्न हुई, जिसका उल्लेख विवेकानन्द ने स्वदेश लौटने पर अपने कलकत्ता के भाषण में किया और जिसने दूसरी छोटी-छोटी तरंगों को निगल लिया।
विवेकानन्द नव-जागरण की इस तरंग के उत्कृष्ट प्रतीक और राजा राममोहन
अतीत की ओर गर्व से देखता है और अपने राष्ट्रीय आन्दोलन में इतिहास से शास्त्रागार का काम लेता है और वह हमारे देश के उभरते हुए पूंजीपति वर्ग ने भी लिया और लेना स्वाभाविक भी था।
इन सब आघात-प्रतिघातों से नव-जागरण की वह भव्य तरंग उत्पन्न हुई, जिसका उल्लेख विवेकानन्द ने स्वदेश लौटने पर अपने कलकत्ता के भाषण में किया और जिसने दूसरी छोटी-छोटी तरंगों को निगल लिया।
विवेकानन्द नव-जागरण की इस तरंग के उत्कृष्ट प्रतीक और राजा राममोहन