योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

की घटनाओं का विवेचन हम अपनी पुस्तक के अन्तिक परिच्छेद ‘बाद की बात’ में करेंगे।


अग्नि-शिखा

‘‘जीवन समर है। मुझे संघर्षरत ही मरने दो।’’

-विवेकानन्द

1 दिसम्बर, 1900 को कोई डेढ़ साल बाद विवेकानन्द अपनी दूसरी विदेश-यात्रा से कलकत्ता पहुंचे। जैसा कि ‘यूरोप-यात्रा के संस्मरण’ से प्रकट है, उनकी राजनीतिक भावना जाने से पहले ही बड़ी तीव्र हो गई थी। इस दूसरी यात्रा का महत्त्व यह है कि पाश्चात्य पूंजीवाद ने अब साम्राज्यवाद का


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की घटनाओं का विवेचन हम अपनी पुस्तक के अन्तिक परिच्छेद ‘बाद की बात’ में करेंगे।


अग्नि-शिखा

‘‘जीवन समर है। मुझे संघर्षरत ही मरने दो।’’

-विवेकानन्द

1 दिसम्बर, 1900 को कोई डेढ़ साल बाद विवेकानन्द अपनी दूसरी विदेश-यात्रा से कलकत्ता पहुंचे। जैसा कि ‘यूरोप-यात्रा के संस्मरण’ से प्रकट है, उनकी राजनीतिक भावना जाने से पहले ही बड़ी तीव्र हो गई थी। इस दूसरी यात्रा का महत्त्व यह है कि पाश्चात्य पूंजीवाद ने अब साम्राज्यवाद का


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