वैसा ही कर लेते थे। लेकिन उन्हें इस बात का दुःख था कि जो देख रहे हैं, गुरू-भाई और शिष्य क्यों नहीं देख पाते
202 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वे जो आहट सुन रहे हैं, उन्हें सुनाई नहीं पड़ती? वे क्यों गौण को प्रधान समझे बैठे हैं?
27 सितम्बर को वे कलकत्ता से अल्मोड़ा के मायावती आश्रम के लिए रवाना हुए। उसे स्थापित करने वाले सेविअर की मृत्यु उनकी अनुपस्थिति में हो गई थी। वह वहां जाकर श्रीमती सेविअर को सांत्वना देना और आश्रम की व्यवस्था कैसी चल रही है,
वैसा ही कर लेते थे। लेकिन उन्हें इस बात का दुःख था कि जो देख रहे हैं, गुरू-भाई और शिष्य क्यों नहीं देख पाते
202 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वे जो आहट सुन रहे हैं, उन्हें सुनाई नहीं पड़ती? वे क्यों गौण को प्रधान समझे बैठे हैं?
27 सितम्बर को वे कलकत्ता से अल्मोड़ा के मायावती आश्रम के लिए रवाना हुए। उसे स्थापित करने वाले सेविअर की मृत्यु उनकी अनुपस्थिति में हो गई थी। वह वहां जाकर श्रीमती सेविअर को सांत्वना देना और आश्रम की व्यवस्था कैसी चल रही है,