थे। हर रोज़ वे अनेक पत्रों का उत्तर लिखते थे। वे लगभग एक महीना वहां ठहरे।
इस बीच शास्त्र चर्चा तो चलती ही रही, उन्होंने ‘प्रबुद्व भारत’ पत्रिका के लिए ‘आर्य और तामिल ‘सामाजिक सम्मेलन भाषण’ और ‘थियोसाफी पर कुछ स्फुट विचार’-तीन लेख लिखे। ये लेख उनके संघर्ष का हिस्सा थे। वे इतिहास को विकृत करके फेलाई गई भ्रम-भ्रांतियों को और पाखंड को कभी नज़र से ओझल नहीं होने देते थे और उन पर कड़ा प्रहार करते थे।
‘प्रार्थना सभा’ के नेता
थे। हर रोज़ वे अनेक पत्रों का उत्तर लिखते थे। वे लगभग एक महीना वहां ठहरे।
इस बीच शास्त्र चर्चा तो चलती ही रही, उन्होंने ‘प्रबुद्व भारत’ पत्रिका के लिए ‘आर्य और तामिल ‘सामाजिक सम्मेलन भाषण’ और ‘थियोसाफी पर कुछ स्फुट विचार’-तीन लेख लिखे। ये लेख उनके संघर्ष का हिस्सा थे। वे इतिहास को विकृत करके फेलाई गई भ्रम-भ्रांतियों को और पाखंड को कभी नज़र से ओझल नहीं होने देते थे और उन पर कड़ा प्रहार करते थे।
‘प्रार्थना सभा’ के नेता