गोविन्द रानाडे ने लाहौर के ‘समाज सम्मेलन’ में अपने अध्यक्षीय भाषण में संन्यासी परम्परा पर कुछ आक्षेप किए थे और उसके लिए वेदों-शास्त्रों के हवाले भी दिए थे। ‘सामाजिक-सम्मेलन’ भाषण’ लेख रानाडे के इसी भाषण के उत्तर में लिखा गया था और उसका अंत इन शब्दों पर हुआ है:
‘‘श्री रानाडे और समाज सुधारकों, ज़िन्दाबाद ! पर ओ अभागे भारत ! आंग्लीभूत भारत ! भोले बच्चे ! मत भूलो-कि इस समाज में कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिन्हें अभी न तो तुम समझ सकते हो,
गोविन्द रानाडे ने लाहौर के ‘समाज सम्मेलन’ में अपने अध्यक्षीय भाषण में संन्यासी परम्परा पर कुछ आक्षेप किए थे और उसके लिए वेदों-शास्त्रों के हवाले भी दिए थे। ‘सामाजिक-सम्मेलन’ भाषण’ लेख रानाडे के इसी भाषण के उत्तर में लिखा गया था और उसका अंत इन शब्दों पर हुआ है:
‘‘श्री रानाडे और समाज सुधारकों, ज़िन्दाबाद ! पर ओ अभागे भारत ! आंग्लीभूत भारत ! भोले बच्चे ! मत भूलो-कि इस समाज में कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिन्हें अभी न तो तुम समझ सकते हो,