वरन् उनकी जादूगरी के करतबों द्वारा जनित वर्षों का कठोर परिश्रम ही उनकी देन है। लेखक महोदय को यह ज्ञान होना चाहिए था कि श्री मैक्समूलर जैसे विद्वान और श्री एडविन आर्नल्ड जैसे कवियों का पल्ला पकड़कर और साथ ही इन लोगों पर कीचड़ उछालते हुए-तथा स्वयं अपने आपको विश्व-ज्ञान का एकमात्र मात्र बताते हुए थियोसोफिस्ट लोग पश्चिम के सामज में रेंगकर घुस जाना चाहते थे। और हम तो राहत की सांस लेते हैं कि यह अद्भुत ज्ञान एक रहस्य बनाकर ही रखा जाता है। भारतीय चिंतन,
वरन् उनकी जादूगरी के करतबों द्वारा जनित वर्षों का कठोर परिश्रम ही उनकी देन है। लेखक महोदय को यह ज्ञान होना चाहिए था कि श्री मैक्समूलर जैसे विद्वान और श्री एडविन आर्नल्ड जैसे कवियों का पल्ला पकड़कर और साथ ही इन लोगों पर कीचड़ उछालते हुए-तथा स्वयं अपने आपको विश्व-ज्ञान का एकमात्र मात्र बताते हुए थियोसोफिस्ट लोग पश्चिम के सामज में रेंगकर घुस जाना चाहते थे। और हम तो राहत की सांस लेते हैं कि यह अद्भुत ज्ञान एक रहस्य बनाकर ही रखा जाता है। भारतीय चिंतन,