स्वस्थ, आध्याम्मिक, कर्मठ और देशभक्त लोगों को पाखंडियों और आघ्याम्मिक होने का ढोंग करने वाले पतनशील व्यक्तियों से अलग कर देगा।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 304)
लेकिन विवेकानन्द की इस चेतावनी तथा विरोध के बावजूद एनी बेसेन्ट के थियोसाफिस्ट हमारे देश में पाखंडियों तथा पतनशील व्यक्तियों को आगे बढ़ाने और चेतना को कुंठित करने में काफी हद तक सफल रहे।
चार दिन तक बर्फ और फिसलती चट्टानों पर से उतरते हुए विवेकानन्द 24 जनवरी, 1901 को कलकत्ता के बेलूर मठ में लौट आए।
स्वस्थ, आध्याम्मिक, कर्मठ और देशभक्त लोगों को पाखंडियों और आघ्याम्मिक होने का ढोंग करने वाले पतनशील व्यक्तियों से अलग कर देगा।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 304)
लेकिन विवेकानन्द की इस चेतावनी तथा विरोध के बावजूद एनी बेसेन्ट के थियोसाफिस्ट हमारे देश में पाखंडियों तथा पतनशील व्यक्तियों को आगे बढ़ाने और चेतना को कुंठित करने में काफी हद तक सफल रहे।
चार दिन तक बर्फ और फिसलती चट्टानों पर से उतरते हुए विवेकानन्द 24 जनवरी, 1901 को कलकत्ता के बेलूर मठ में लौट आए।