योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

जी को शिलांग के गए। लेकिन इससे कुछ लाभ नहीं हुआ। उल्टा दमा यहां तक बढ़ गया कि किसी भी समय प्राण त्याग देने का भय पैदा हो गया। इस स्थिति में भी वे शान्त रहे और बड़बड़ाते हुए बोले, ‘‘यदि देह त्याग भी हो जाए, फिर भी क्या ? मैंने जगत् को वर्षों तक सोचने योग्य साधन दिए हैं’’

इस यात्रा से वे जब बेलूर मठ लौटे तो दमे के अलावा बहुमुत्रता के रोग से भी काफी कष्ट पा रहे थे और सूजन भी दिखने लगी थी। वैद्य की चिकित्सा होने लगी। उनकी हालत देख सभी लोग चिंतित थे,


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जी को शिलांग के गए। लेकिन इससे कुछ लाभ नहीं हुआ। उल्टा दमा यहां तक बढ़ गया कि किसी भी समय प्राण त्याग देने का भय पैदा हो गया। इस स्थिति में भी वे शान्त रहे और बड़बड़ाते हुए बोले, ‘‘यदि देह त्याग भी हो जाए, फिर भी क्या ? मैंने जगत् को वर्षों तक सोचने योग्य साधन दिए हैं’’

इस यात्रा से वे जब बेलूर मठ लौटे तो दमे के अलावा बहुमुत्रता के रोग से भी काफी कष्ट पा रहे थे और सूजन भी दिखने लगी थी। वैद्य की चिकित्सा होने लगी। उनकी हालत देख सभी लोग चिंतित थे,


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