योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

‘‘रख दे तेरे नियम-फियम। इनमें से यदि एक भी व्यक्ति आदर्श जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार हो तो मेरा सारा श्रम सार्थक होगा। दूसरों के कल्याण के लिए होने दो देहपात, क्या आता जाता है इससे ? ये लोग कितनी दूर से कितना कष्ट सहकर मेरी दो बातें सुनने के लिए आए हैं और यों ही लौट जाएंगे ? तुम लोगों से कुछ बन सके करो, मैं जड़ की तरह चुपचाप न रह सकूंगा।’’

205 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

भूपेन्दनाथ दत्त ने अपनी पुस्तक में एक घटना


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‘‘रख दे तेरे नियम-फियम। इनमें से यदि एक भी व्यक्ति आदर्श जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार हो तो मेरा सारा श्रम सार्थक होगा। दूसरों के कल्याण के लिए होने दो देहपात, क्या आता जाता है इससे ? ये लोग कितनी दूर से कितना कष्ट सहकर मेरी दो बातें सुनने के लिए आए हैं और यों ही लौट जाएंगे ? तुम लोगों से कुछ बन सके करो, मैं जड़ की तरह चुपचाप न रह सकूंगा।’’

205 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

भूपेन्दनाथ दत्त ने अपनी पुस्तक में एक घटना


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