के पास जाकर मेरा नाम लो। अगर वे न माने तो मैं अध्यक्षता करूंगा।’’
आने वालों के साथ बातचीत के अलावा विवेकानन्द पढ़ने में व्यस्त रहते थे। अध्ययन उन्होंने आजीवन जारी रखा। उनके शिष्य शरच्चन्द्र चक्रवर्ती ने अपनी पुस्तक ‘विवेकानन्द जी के संग’ में लिखा है:
‘‘कविराज की औषधियों के कठोर नियमों का पालन करते हुए स्वामी जी का आहार तथा निद्रा छूट चुकी थी। निद्रादेवी ने तो उन्हें बहुत दिनों से एक प्रकार से मानो त्याग ही दिया था।
के पास जाकर मेरा नाम लो। अगर वे न माने तो मैं अध्यक्षता करूंगा।’’
आने वालों के साथ बातचीत के अलावा विवेकानन्द पढ़ने में व्यस्त रहते थे। अध्ययन उन्होंने आजीवन जारी रखा। उनके शिष्य शरच्चन्द्र चक्रवर्ती ने अपनी पुस्तक ‘विवेकानन्द जी के संग’ में लिखा है:
‘‘कविराज की औषधियों के कठोर नियमों का पालन करते हुए स्वामी जी का आहार तथा निद्रा छूट चुकी थी। निद्रादेवी ने तो उन्हें बहुत दिनों से एक प्रकार से मानो त्याग ही दिया था।